जानते हो न ...अभिमन्यु को
वही ....अर्जुन पुत्र
सुभद्रा के गर्भ से ज्ञान सीखकर आया था दुनिया में
निष्ठुर दुनिया ने परीक्षा ले डाली उसके ज्ञान की उम्र के सोलहवे साल में
ओह ..माँ की तंद्र न टूटी और वंचित रह गया ..
चक्रव्यूह की रचना ने उसे लील लिया
सगे सम्बन्धी लूट ले गये बाल-जीवन
युद्ध क्रूर होता है ...लेकिन वीर खौफ नहीं खाते
युद्धरत रहते हैं प्रतिपल
अंतिम द्वार बना काल उसी अभिमन्यु का
सुनी है न तुमने ..
एक चक्रव्यूह रचा गया था द्वापर में
एक तुमने रच डाला ..
गर्भ में नहीं सीखा था चक्रव्यूह तोडना ..अभिमन्यु तो रहा नहीं
न माँ सुभद्रा थी न पिता अर्जुन
कर्मबेधी हुनर सीखते रहे दुनिया के व्यूह में रहकर
और इक दिन दुसरे चक्रव्यूह ने मुझे भी व्यूह के केंद्र में धर पटका लाकर
प्रयास जारी है ..उसी एक दिन से आज भी
डूबते उतरते हैं जब तक जीवन है प्रयास है ..
प्रयास है तो शायद जीवन है ..
यहाँ द्रोण कृपाचार्य दुशासन है तो सभी मगर ...
दीखता नहीं है कोई भी ..
मौत का इंतजार है सभी को फिर भी ..
एक आशा है जो छूटती ही नहीं
जिन्दा रहने का अनथक प्रयास यूँही जीवन धारा के मझधार में
डुबाता उबारता है मुझे ,,
और फिर जीवन के लिए प्रयास फिर एक नया द्वार खुलता है चक्रव्यूह का
खींचता है मौत के झंझा की और ..मगर
इक नया प्रयास फिर बचा लेता है ...और
यद्यपि मैं अभिमन्यु नहीं मगर फिर भी ...
यही क्रम क्रमानुसार चल रहा है और कदम बढ़ रहे है
कभी सप्रयास कभी अनायास ..
जानिब ए मंजिल ...
आजभी
क्रमश: !!---- विजयलक्ष्मी
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