Wednesday, 12 March 2014

" यूँ तो मुझे इंकलाबी गीत नहीं आता ,"

यूँ तो मुझे इंकलाबी गीत नहीं आता ,
कहाँ से कैसे आएगा ... कौन सिखाएगा ...ये भी नहीं मालूम ...
रक्त का खौलना ,आग का लगना दिल में ..देखा नहीं कभी 
आसमान से गिरता हुआ बरसात का जल देखा है ...

गिरकर छितराए हुए टुकड़ों को देखा है कभी
महसूस किया है लहू का सरसराना ...झन्नाटे की रफ्तार से ,
काप उठती है काया जब ...और आंख से गिरता है गर्म पानी का सोता निकलकर 
एक हूक जो सुनी नहीं जाती कानों से ..किन्तु ...तपा देती है कपाल को
और ...और ..
जैसे बह उठती है इक नदी सी आप्लावित हो..
जब जब राष्ट्र विरोधी उठाती है आवाजे ..
और सरसराहट बदलने लगती है ..सुनामी की मानिंद दिल औ दिमाग पर
चल पड़ने को कहता है समय पुकार कर ,,
चूड़ियों की खनखनाहट सुनती है सत्ताधारियों के हाथ में
और मन उन्मादित सा लोकतंत्र की सोयी जनता को ललकार उठता है ,
बिके वोट गर्त में गिरा देते हैं ...हमारे पौरुष को
लज्जित होता है हर मस्तक ..जब सीमा पर मस्तक कटता है ..
ले कृपाण क्यूँ न हलाक कर दिया जाये दुश्मन के सर को ..
क्यूँ न उतारा कृपाण ,खंजर या चाकू ...जो चीरकर सीना हर दाग धो दे ईमान का ..
सने हाथ लहू से अच्छे नहीं लगे यूँ तो कभी ..किन्तु
सीना दुश्मन का हो तो क्यूँ न रंग होली का बनाकर लहू की होली खेल ली जाये ..
गर्वित हो धरा ..क्यूँ न जन्मदायिनी भारत माँ की पिपासा भी शांत की जाए,
क्रांति भी भ्रान्ति ही न हो ..बस खौफ इसी का है ..
न हो फिर कोई जैचंद बीच में आ जाये ,
और फिर पृथ्वीराज को कैद हो ,,
विकास की उठती लहर न थम जाये किसी बिके जमीर के हाथों ..
आओ ,,सम्भलो ..वोट की तगड़ी चोट हो ,
इसबार रूपये साड़ी शराब के बदले न बिकती वोट हो .-- विजयलक्ष्मी

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