Saturday, 15 March 2014

".कीमत हमारी ...बस, तुम्हारा ईमान है,"

आम आदमी आम नहीं रहा ख़ास हो गया ,
नाराजगी का हक जनता को था आजतक 
देखो पत्रकारिता से खास भी नाराज हो गया 
चढाने लगा है गुल श्रद्धांजलि के खुद भी ..
किसी हम जैसे ने कहा तो ...नाराज हो गया 
दोस्ती का चस्का खत्म हुआ लगता है आजकल 
खुद को देखता नहीं ,गिरेबाँ में अपने झांकना नागँवार हो गया 
रंग ए वफा तो देखिये.... खर्चा ए चर्चा भी दुश्वार हो गया 
जेल की धमकी अजी देते किसे हो ,,
हम तो बदनाम है देश निकले के नाम पर .
बिके हुए लोग बिकी हुयी कलम ..जो खुद बिक गये उन्हें भी आती नही शर्म
माना, ईमान पर तेरे नाम के छींटे हैं ,,,लेकिन छोड़ा तो नहीं करना अपना कर्म
हम संशय में नहीं जिन्दा ...और उबरे भी नहीं है
ये अलग बात है ..तुमसे मिलते भी नहीं हैं ..
किसी साडी किसी बोतल में बिकेंगे नहीं हम .".कीमत हमारी ...बस, तुम्हारा ईमान है,"
लो ,खरीद डालो .... भरे बाजार में खड़े हैं .-- विजयलक्ष्मी

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