Saturday, 22 March 2014

" देश का सच लिखूं या देश की बेजारी लिखू "

देश का सच लिखूं या देश की बेजारी लिखू 
लिखूं बहता लहू गरीब का पानी सा .. भूख लिखूं या उसकी लाचारी लिखूं 
लिख दूं खेत में जलती फसल नफरत की आंच पर 
लिख दूं तूफानी हवा या ओलो को पडती झड़ी 
लिख दूं बेटी का नजरों से गुजरना साहूकार की और कांपना माँ के दिल का 
लिख दूं भेद भरी नजरों से दुनिया का ताकना 
लिख दूं घर में कैद बेटी बहु की छटपटाहट ...जिन्हें सिसकने की आजादी नहीं 
लिख दूं दर्द माँ का जिसका सपूत ब
ेच गया जमीं जायदाद विदेश जाने की खातिर
लिख दूं उस बहन का दर्द .. 

भाई सीमा पर मारा गया और खबर भी न ली सरकार ने
लिख दूं बहन की आँख के सपने टूट गये बेटे की पढ़ाई पर
लिख दूं वही सफरनामा जहां ख्वाब देखने की मनाही है कुँवारी आँखों को
लिख दूं वो सफर जब मुहब्बत के नामपर बेच दी घर शादी की खातिर लाइ इक लडकी
लिख दूं पुलिस की दलाली का किस्सा रपट लिखवानी थी शहर के बदनाम व्यक्ति की
लिख दूं उसी पाती की कहानी किसान की जुबानी जिसमे बैंक से कर्जा लिया जाना था
लिख दूं सभी बातें कर्ज की खातिर कितना हिस्सा रिश्वत दिया जाना था
लिख दूं दलाल ने पैसा खाकर प्रधानमन्त्री के नाम पर जब लाइसेंस बनवाया था
लिख दूं दलाल उसी आदमी को जो नौकरी की खातिर साथ लाया था 

लिख दूं भरी जवानी हुयी विधवा पर कितनी नजरे थी गडी पैनी होकर
लिख दूं दफ्तरी को कितने पैसे देकर फ़ाइल को निकलवाया था
लिख दूं चुनावी रात से पहले दारू साडी और पैसो का बंडल पड़ोसी के घर भी आया था
बहुत मुश्किल बयाँ करना हकीकत ..
कसम सच्चाई की खाकर खुद कितना झूठ बोल आया था
मास्टर जी ने भी पढ़ने की खातिर घर अकेले ही बुलाया था
इल्जाम को उठी ऊँगली तो चोरी का इल्जाम लगाया है
टीवी पर कल रात ही सीता सावित्री को नहीं सनी लियोन को दिखाया था
छोड़कर देशभक्तों की तस्वीर ...बुत किसी फ़िल्मी हीरों लगवाया था
मनचली करने की ट्रेनिग के स्कूल खुल गये हर नुक्कड़ पर
हिन्दू मुसलमान की बात छोडो ..जाती के नाम पर ही देश को बटवाया था
क्या लिखूं क्या छोडूं कितनी गिनाऊँ सत्य की तस्वीर जब जब पलटी
कहाँ से लाऊँ सबूत पत्रकारिता पर भी बिके होने का आरोप कल ही लगाया था
दर्द के किस्से पुरानी लगती है हर बात ...
देह बेच राजनीती का आरोप था जिसपर उसी औरत को अबला कहकर इनाम लिस्ट में उपर पाया था ..
सच कहना भी मुश्किल है ..और सच सुनना भी मुश्किल
यहाँ मौकापरस्ती का बोलबाला है ..
खुद को बचाने की खातिर जाने किस किस पर क्या इल्जाम लगा डाला है
जिसने जितने कत्ल किये उसे ही खुदा कह डाला है ..
इक मेरी किस्सागोई को भला अब कौन सुनने वाला है ..-- विजयलक्ष्मी

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