मौसम है कि ...थम ही नहीं रहा
उपर वाले को क्या सूझ रही है
ठिठुर रहा है खुद भी और साथ अपने दुनिया को भी
वसंत आकर भी नहीं आएगा क्या
या
फाग बरस रहा है
आकाश की छाती चीरकर
आखिर क्यूँ ..?
जलवृष्टि भी सुनी जाये
किन्तु ..
जम गये अहसास गिर रहे है श्वेत रंग में डूबकर
ठिकाना मिलकर भी नहीं मिला शायद ..
ये कैसा अहसास है ...
जो रिसना भूलकर जम गया भीतर ..
टूटकर बिखर रहा है बेसाख्ता बिन मौसम
मगर फूल है
चाहत मुस्कुराने की लिए आंख खोल रहे हैं धीरे धीरे
जीवन की आस ...
एक हौसला ..
जीवन के झूले पर पेंग बढ़ाने का
मुर्दा हुए पलो में रंग भरने का
क्यूंकि ..
हौसला ही जीवन की पहली और अंतिम सीढी है .- विजयलक्ष्मी
उपर वाले को क्या सूझ रही है
ठिठुर रहा है खुद भी और साथ अपने दुनिया को भी
वसंत आकर भी नहीं आएगा क्या
या
फाग बरस रहा है
आकाश की छाती चीरकर
आखिर क्यूँ ..?
जलवृष्टि भी सुनी जाये
किन्तु ..
जम गये अहसास गिर रहे है श्वेत रंग में डूबकर
ठिकाना मिलकर भी नहीं मिला शायद ..
ये कैसा अहसास है ...
जो रिसना भूलकर जम गया भीतर ..
टूटकर बिखर रहा है बेसाख्ता बिन मौसम
मगर फूल है
चाहत मुस्कुराने की लिए आंख खोल रहे हैं धीरे धीरे
जीवन की आस ...
एक हौसला ..
जीवन के झूले पर पेंग बढ़ाने का
मुर्दा हुए पलो में रंग भरने का
क्यूंकि ..
हौसला ही जीवन की पहली और अंतिम सीढी है .- विजयलक्ष्मी
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