Wednesday, 12 March 2014

" खुद भी कानून का ही पहरेदार था "

इक दीप जलाया है इंतजार का ,
होगी सहर वतन में एतबार का ,

कीचड़ भरी राहे मेरे ही गाँव की
होगा कभी मौसम खुशगंवार सा,

आशा-दीप यूँही बुझता नहीं देखो
पतझड़ बाद ही मौसम बहार का ,

गुमे दलाल कमिशन की ओट में
भूखा मरा वो रोटी का हकदार था ,

हमने देखा अँधेरा उसी के घर में
जो करता दीपकों का व्यापार था,

क्यूँ नफरत बनी उसी की खातिर
जिसे बस दुआओं से सरोकार था

अजब रीत जिला-बदर था वही
खुद भी कानून का ही पहरेदार था .- विजयलक्ष्मी

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