Monday, 1 October 2012

काश !!हम बड़े न होते ...





















बचपन के रंग,

सब सखा सखियों के संग ,
जीवन के सुंदर सलोने खेल
आपस का मीठा मेल ,वो रूठना मानना ,
कभी कुट्टी कभी अब्बा ,पतंग का उड़ाना ,
मिलकर साथ पढ़ना ,दिस्तों के बीच आना ,

दीवाने से बादलों से रिमझिम बरसता पानी,
इठला कर भीगना उसमे जैसे कोई दीवानी ,
यादों में आज भी ताजगी उन्ही पलों की,
अनजान थे दुनियादारी ,बहुत सुहानी जिंदगानी थी ,
खुशियों के मौजूं थे , नादानियों में भी रवानी थी ,
इंद्र धनुषी रंग बिखरे थे चहुँ ओर ,
कागज की किश्ती ,कंचों की ठौर ,
थोड़े से रंगीन कागज ,कुछ पुराने सिक्के ,रंगीन से डाक टिकट ,
पेन्सिल रंग कागज ,गेंद ,कुछ खिलते बगिया के फूल ...
हमारी रियाया हुआ करते थे ,
उस छोटी सी खूबसूरत दुनिया के हम ही शहंशाह,
हम खुद ही मुलाजिम हुआ करते थे,
काश !!हम बड़े न होते ...
उसी खूबसूरत दुनिया के आज भी शहंशाह होते .-- विजयलक्ष्मी

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