Friday, 5 October 2012

निस्स्वार्थ सूरज रोशन हों रहा है ..




























शर्तों के पायदानों पैर रख चढने की चाह ,
बिना शर्त कदम भी बढाकर देख जरा ,
माना खौफ रहता है गिरने का जमीं पर ,
मगर उससे इतर कोई गिरा भी नहीं सकता ,
भरोसा खुद का और खुद से ही खो जाये ,
राह मंजिलों की फिर क्यूँ न खो जाये ..

खाद पानी बरसात के अलग भी कुछ चाहिए ..
खेत में खड़ी फसल को खरपतवार खाती है बिन किसान के
नेता है हेराफेरी करेगा जरूर ..कोई नहीं उस जैसा ...नेता वही तो हों
न्याय के लिए रास्ता भी सीधा नाप ..
यूँ तो न्याय भी बिक चुका बाजार में
गोदाम का रास्ता मुश्किल है मिल सके...
खरी दूकान पर मिलता टका सा जवाब ,
पवित्रता मिली न गर क्यूँ राह माप ले ..
भूख कितनी है बाकी थाह नाप ले ...
निस्स्वार्थ सूरज रोशन हों रहा है
जल रहा गगन में खुद भी ,धरती को जीवन दे रहा..
पहने हरित बाना सज रही धरा ..-- विजयलक्ष्मी

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