Friday, 5 October 2012

एक अहसास ..

मुहब्बत में तो पत्थर हों जाते है लोग ...
हंसना रोना क्या खुद को भूल जाते है लोग .-- विजयलक्ष्मी


बहते हैं आंसूं पत्थरों में आजकल ,
देखने को उन्हें भी नजर चाहिए .-- विजयलक्ष्मी


भूलता नहीं किसी को अंधेरों में भी दरकार ए यार हों,
देर से ही सही मगर अहसास पहुंचते जरूर है गर प्यार हों .-- विजयलक्ष्मी


क्या कम था कि वो चले आये ..कुछ सकूं तो मिला 
न आते तो सोच आँखों को क्या दिल भी सकूं न पाता .-- विजयलक्ष्मी


वक्त ए ख्याल जन्नत क्यूँ सोचता है दिल ,
गर वो नहीं यहाँ तो दोजख हुयी महफ़िल ..-- विजयलक्ष्मी


कोई भी एक लम्हा जो जुदा किसी तरह ,
जन्नत का क्या करेंगे ,लगे है दोजख की तरह .-- विजयलक्ष्मी

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