Thursday, 11 October 2012

बस एक ही नाम लिखा था ...

क्या क्या छोड़ दूँ ए वक्त तेरे साथ के बिना ,
याद ,अहसास ,सफर या वो ठिकाना जिस पर तेरा नाम लिखा था .
कदमों को क्या कहूँ उक जाऊं बेसबब ,
या डूब जाऊं नदिया नाव सी जिस मझधार एक पैगाम लिखा था .
कत्ल होती सहर तारों के विदा क्यूँ हों ,
दिन की मौत के बाद इन्तजार ए सहर है जिसपर नाम लिखा था .
कदम चल दिए रोकने के बाद भी यूँ ,
उस एक छोर पर जैसे सूरज ने गगन पर कभी वो नाम लिखा था .
अब छल रहा क्यूँ वक्त मुझको बता ,
वो पैमाइश ए तहरीर बनी वसीयत पे तो बस एक ही नाम लिखा था .- विजयलक्ष्मी

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