Monday, 23 January 2017

" है बेगैरत सूरज भी साम्प्रदायिकता फैलाता है ,,"

है बेगैरत सूरज भी साम्प्रदायिकता फैलाता है ,,
इसे भी उगते .. डूबते हुए केसरिया रंग भाता है ||

चाँद को समझाया कितना सुनता ही नहीं है
कौन धर्म में त्यौहार पर कभी पूर्णिमा मनाता है ||

काश सितारों से यूँ शिकवे शिकायत न होती
एक नहीं सप्तको के मंडल में भी ऋषि बिठाता है ||

कैसे कायनात, दुश्मनी दिखाती है क्यूँ भला
ईश्वरीय बद्री,बरगद, तुलसी,दूब से बताया नाता है ||

समझाया कई बार तजे केसरिया बाना अब
जबसे इस दुनिया में आया इससे अपना नाता है ||

डरकर बदले रंग वही हमे क्यूँ आँख दिखाते हैं ,,
कब किसी का हुआ सगा जो पुरखो को भूल जाता है ||

नारजगी की बात पर मुस्काया खिलखिलाया
बोले गगन कैसे बदलू धर्म धरा से जन्मों का नाता है|| ------- विजयलक्ष्मी


1 comment:

  1. आपकी लिखी रचना "पांच लिंकों का आनन्द में" बुधवार 25 जनवरी 2017 को लिंक की गई है.... http://halchalwith5links.blogspot.in पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!

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