Wednesday, 11 January 2017

" काश कोई चादर यहाँ भी चढ़ा देता ,,"

" काश कोई चादर यहाँ भी चढ़ा देता ,,
सवाब मिलता सौदे में जन्नत लेता ||

सुना हराम है बुतपरस्ती जमाने में
पत्थर की मजार पर क्यूँ मन्नत लेता ||

बुत-तराश कहूँ कैसे बुत-शिकन को मैं
छोड़ झगड़े मजहबी इन्सान समझ लेता ||

हालत है नाकाफी क्यूँकर हुए ये हाल
दंगों की निशानी,, मालदा का नाम देता ||

कभी मुजफ्फरनगर हुआ कभी कैराना
किसने दंगा-पीड़ितों का पुरसा हाल देखा ||

जनसंख्या-विस्फोटक पहुंची क्यूँ सोचना
अच्छा नहीं हमेशा सत्य में खयानत कर देना || "
------- विजयलक्ष्मी


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