Sunday, 15 January 2017

" पाँव देहलीज पर ठहरे ,लगे सामाजिकता के पहरे "

पाँव देहलीज पर ठहरे ,लगे सामाजिकता के पहरे
बताओ दर्द की लहरें हमे नहलाये भी न भला कैसे ?

अंकुरित पौध को हवा खाद पानी की जरूरत बहुत
बंजर जमीं पर कैक्टस उग आयें भी न भला कैसे ?

नयन कजरारे बदरा से भरे ठहरी हुई जलधार है
हालात पर दिल के होठ मुस्कुराएँ भी न भला कैसे ?

रोटी घास की खाकर बिलखते भूख से बच्चे किन्तु
राणा के वंशज दाल-रोटी खपाए भी न भला कैसे ?

वो लड़ते आन की खातिर ,जीवन मान की खातिर
मातृभूम-हित समर्पित मन जगाए भी न भला कैसे ?

जिन्हें रोटी की चिंता सताती है, दीवाना कहे कैसे
भगतसिंह सुभाष की हालत पढाये भी भला कैसे ?

खरा उतरने की तमन्ना में भट्टी पर चढ़ बैठे जो
चाहे बनना आभूषण उन्हें तपाये भी न भला कैसे ?

होठ हंसते रहे लेकिन सुलगते अंगार हो दिल में
तपिश से खिलते हुए सपने सताये भी न भला कैसे ?
--- विजयलक्ष्मी

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