Saturday, 7 January 2017

" उन्मुक्तता या प्राकृत ,,"

" उन्मुक्तता या प्राकृत ,,
पहले प्रकृति का विदोहन किया 
फिर बन्धन में बाँध दिया ..
इक चिरैया धर पिंजरे में ,,
प्रभु की कृति का अपमान किया 
फिर जाल बुने तानो बानो के
उनमे भी बेजान किया ..
ढूंढ मरा कहता फिरता है ...........
उन्मुक्त औरत में सौन्दर्य भरा ,,
सुन उस सोन चिरैया को सिखला पहले ...
प्राकृत रूप कहे किसको ,,
परखा कैसे रूप कुरूप ..कैसे संतुलन मान किया
कैसे मन को समझाया था ..
औरत को औरत समझा था ,,या
एक खिलौना मान पिया
जब मन पूरित ,, तब उद्धारक बनना याद किया ,,
तुम सृजक हुए न पालनकर्ता ,,
न तुमने प्राकृत प्रकृति का सम्मान किया
कभी सभ्य कहा खुद ने खुद को
पत्थर में प्रभु भान किया ..
कभी असभ्य बनकर कोंचा नोचा
और प्रभु को भी पत्थर मान लिया ,,
मतिमंद हुए या भ्रमित कहूं ..या कह्दू संहारक तुम ही
कभी खुद के भीतर तू झांक मनुज ,,
कुल दीपक ही कुल घातक तुम ही || " ------- विजयलक्ष्मी


..

" काटकर पंख कहते रहे उड़ान को ,
पिंजरे की मैंना को बोले बस देखो मचान को
बैठे है बन सैयाद पहरे पर सदा से 
झपटने को, ताक में बैठे रहते है तैयार ,
निकले तो सही खोलकर पिंजरे को बाहर .

दिखाते है औकात सुनाकर उल्टी बात ,
उसपर इल्जाम करते बदनाम किस कदर
कटे पंख देख अपने घायल हुआ सैयाद है आजतो ,
रुख का नकाब कैसे उठेगा ?
कौन सुनेगा फरियाद को ?
तुम्हे शौक रहा पत्थर भर हाथ का
मारे दिए उठाकर पत्थर तलाक का
झक सफेद मन पर लहू गिरता चला गया
बिखरा है आग बनकर पत्थर तलाक का
बुझता नहीं वो हलाला के हलाले में
रख दिया है उस तहजीब को तहखाने में
इन्सान समझो तो ..कोई बात बने ,,
इंसानी रुतबा हो तो कोई बात बने ,,
कोई नजरिया बदले तो इंसानी जात बने
खबीस .. नजरिये ने उजाड़ी जो बगिया
कोचते हैं ईमा ,,सोचते है स्वार्थ ,,
इंसानियत नदारत रूहानियत का दावा ,,
वाह रे फरिश्ते ...भला किया ,,कोई दुबारा नहीं आता ||"
.----- विजयलक्ष्मी

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