Tuesday, 17 January 2017

" जीवन की अलिखित कविता को स्वर जिसने दिया ,,"

जीवन की अलिखित कविता को स्वर जिसने दिया ,,
बाकि करते रहे दिखावा ,ये जीवन तो उसी ने जिया ||

पथिक बहुत मिलते रहते हैं ,, सहभागी सहचर कहाँ ,,
कंटक चुभे चुभते ही रहेंगे, दर्द उसीका जिसने पिया ||

राजपथ पर हैं वही जिनके सोने के चम्मच थे मुख में ,,
जनपथ कर्मपथ बना उसीका भूख को जिसने जिया ||

वार लिए फिरता है देखो,, धार कुंद क्यूँकर है आज ,,
कलम बने तलवार वही भावों का गरल जिसने पिया ||

युगयुगीन धरोहर अपनी क्यूँ लुटती देखी चौराहों पर ,,
राष्ट्रपथ चढ़े वही तज अहम स्वाभिमान जिसने जिया ||

सत्य कहूँ पर्दे की लीला जिसने औरत को ही लीला ,,
अदनाभाव है मन के भीतर का औरत ने हरबार जिया ||

गर मान नहीं दे सकते तुम पिंजरे में तो मत कैद करो,,
स्नेह समर्पण सरल ह्र्दया ने छलकपट हर बार जिया ||
------- विजयलक्ष्मी

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