Sunday, 2 November 2014

" मन पंछी को भेज रही हूँ .."



" तुम पढ़ लेना मेरे खत को 
कोरा सा पन्ना भेज रही हूँ ,
सब अहसास उतार दिए हैं 
प्रेम प्रीत की बाते लिख डाली 
लिख दिये इजहार के रंग 
लम्हे बंधे हैं इन्तजार के
कुछ टुकड़े से भेज रही हूँ
राग रागिनी तुमको सौपी
भेज रही मन तरंग
दिन भेजू कैसे रात अँधेरी
पुष्प सभी मुरझाने वाले
काटों का कैसे भेजू चमन
ख़ामोशी को भेज रही हूँ
जब लिखती हूँ खारा नीर टपकता
बताओ कैसे वो खारापन भेजू
याद भेजना हो मुमकिन कैसे
मन पंछी को भेज रही हूँ
कैसे डाकिये के हाथ सहेजू
कविता में मुझको पढ़ लेगा वो
अकविता तुमको क्यूँकर भेजू
खत पढ़ा है जब से सोच रही हूँ
पढ़ लेना मन की भाषा
आशा तुम संग सहेज रही हूँ
क्या रख छोडू क्या भेजू तुमको
तुम पढ़ लेना मेरे खत को
कोरा सा पन्ना भेज रही हूँ
,"----- विजयलक्ष्मी 


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