Monday, 3 December 2012

मेरी सुध किसी को हों तो सही ..

मेरे अपने अँधेरे मिटे तो 
सोचूं दुनिया की खातिर ,
मैं दीप बन जलूं कैसे, बतला ,
मेरे पेट की आग बुझे तो सही ,
कभी पैटोल जलाता है मुझको ,
डीजल या कैरोसीन की क्या बात कहूँ,
जलता हूँ तेल बन सरसों का ,
दुनिया की बात अब क्या करूं ,
खीज रहा गेहूं पड़ा मैदानों में ,
भंडारों की बात मैं कैसे कहूँ ,

नहीं भूख आटे के कनस्तर की मिटती मेरे ,
भोज की बात मैं कैसे करूं ,
पीर बिवाई मैंने सही
उजालों की बाट मैं कैसे निहारूं,
मुस्तकबिल की सोचूं भी कैसे भला ,
मुझे अपने आज का पता तो हों .
तारीकियों का अंजाम क्या ढूँढू ,,
अदना सा आम आदमी हूँ ,,,
मेरी सुध किसी को हों तो सही ..
मुझे फुर्सत खुद की खातिर नहीं ,,
बता ,,,इन्कलाब मैं कैसे करूं.- विजयलक्ष्मी

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