Monday, 17 December 2012

जग जाओ सोने वालो ,अभी वक्त कहाँ है ...

"जाग जाओ सोने वालों ,अभी वक्त कहाँ है ,
देश जल रहा है अपनों के हाथों से ,
दिखावा देश प्रेम का ,देश को छलने की बातों से ,
जो अपने से दिखते तो है मगर होते नहीं ,
देश की नब्ज टटोलते तो है मगर रोते नहीं ,
शब्द आरक्षण काश शब्द ही बन गया होता ,
जिन्हें आरक्षण मिला ये नेता उनसे देश चलवाते नहीं ,
स्वार्थ की दूकान चल रही है आजकल ,
सफर लम्बा है यात्रा जरूरी है ये ...
जिंदगी की राहे कुछ जरूरी भी है ये ,

फिर न कहना हम तन्हा है यहाँ ...
देश के नाम पर रोने बहुत कम है यहाँ ,
प्रेम तो है मगर देश से कम है ,,,
कलदार अगर मिल जाये तो चोरी भी करम है ,,
नए किससे तमाम लिखूँ कैसे ,
लकीरों पे कोई नाम लिखूँ कैसे ..
मेरी झोपडी में एक चिराग जला है ,,
उसमे देश प्रेम का बस एक ही राग पला है ,
तलवार खंजर कृपाण सबसे हुआ क्यूँ गिला है ,
जिंदगी फलसफों के बीच हकीकत का काफिला है ,
और हम बेदम से इन्तजार में ...
काश तुम भी यही हों तो देश की कोई नई खबर नुमाया हों जाये ..
ख्वाब जो पलकों पे सजे थे ,,,,सरमाया हों जाये
."
.-
विजयलक्ष्मी

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