Tuesday, 4 December 2012

हर सहर के साथ जलता है मेरे मंदिर का दिया ....

उदास सी रात ,
उनींदे से कोहरे सी सौगात ,
मुंडेर पर बैठी चिरैया ,सूर्यकिरण का इन्तजार ,
चाँद की बिंदी लगा , चाँदनी पहने थी रात ,
भोर के सूरज से पूछ लेना कल कहाँ खोया था वो ,
दिन मुकर्रर कौनसा था तस्वीर कुछ लाया था वो ,
जा रही है रात मंथर ,दिन निकलेगा न जाने कब ,
रिश्तों की ओढ़ बैठी हूँ ,सच से मुख मोडू कैसे बता ,
तिरोहिता भी तो नहीं हूँ ,
तुम सच हों मैं भी सच ,झूठ तो कोई नहीं ,
हूँ मगर जिस छोर बैठी गलती कोई तो मिले ,
छान मेरी छोटी सही पर बनाई अपने हाथ से ,
नहीं कर सकती कभी जुदा अपने साथ से ,
काश न मिलते कभी दौर तो न आता ये ,
तुम भी खुश थे उस दौर में ,
तुम बुझा दो जलते दीप सा मुझे ...
हर सहर के साथ जलता है मेरे मंदिर का दिया .
एक नदी सी बह उठी क्यूँ .
क्यूँ बादल बरस गए इतने ,
क्यूँ छान उड़ा तूफानों से ,
क्यूँ ममता बह गयी मरूथानो में,
ये कौन सहर जो आज हुई कोहरा सा दिखता नैनों में .. - विजयलक्ष्मी

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