Friday, 15 March 2013

पाबंदियाँ क्यूँ है गर दुनिया पाक साफ ..

बदल गया कानून देश का सोच है गलत मगर ,
लुट रही आब सड़कों पर ,घरों में जलती दहेज पर ,
देखकर सुनहरी बदन ललचाती नजरे घेर कर ..
उम्र गर कमसिन मिले तो नोंचती है नजरे देह धर ..
घे में बची और घर से निकली थी पढ़ने मगर ..
लाइन लम्बी थी खड़ी ..ट्यूशन के बाहर ..
गली नुक्कड़ पे फब्ती कसी जा रही थी ..
घर आकर भी ने बोला उतर किधर जा रही थी ..
क्या करेगी घर से निकल कर तू समझती नहीं नजर ..
ये कैसी नजर है जो जिंदगी को करती है दूभर ..
घर की चार दीवारी में कैद ही भली है तू ..
जानती नहीं दुनिया का चलन ..
मैंने देखी है दुनिया लोग मतलब के लिए ढूंढते है बदन ..
सुना है सैक्रेटरी को अच्छी नजर से नहीं देखते लोग ...
क्यूंकि सुना है बॉस करता है उसका भोग ...
फ़िल्मी दुनिया में कोई शरीफजादी जाती नहीं ...
खेल ही तन का सारा बाकी है सब पर कफन ..
पाबंदियाँ क्यूँ है गर दुनिया पाक साफ ..
फिर भी समझा दोयम दर्जे का प्राणी क्यूँ खुद को ..
हमने तो नहीं कहा ....वाह रे पुरुष समाज .....!!
-- विजयलक्ष्मी 

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