Monday, 7 December 2015

" बम के गोले हाथ उठाये घूमते मिले खुदाई धिक्कार के लिए "

" इन्सान हूँ शायद बकाया दर्द बहता है मुझमे इसीलिए ,,
पत्थर-दिल नेता हमारे,जीते मिले सभी कलदार के लिए ||

कल डूबते सूरज को देखा शर्मसार सा दिखा था जाने क्यूँ ,,
रात अँधेरी देख समझी,जल न सका बन अंधकार के दिए ||

प्रकृति का प्रबंध, कोई गरीब मर न जाए भूख प्यास से ,,
सडाई नदियाँ सभी, काटे वृक्ष स्वार्थपूरित जरूरियात के लिए ||

स्वास्थ्य का प्रतीक योग धर्म के नाम लिखा गया था कल ,,
हंगामा बरपा रहे हैं वही आज मोहताज बता बीमार के लिए ||

बंटवारा कर दिया धार्मिक फरमाबरदारो ने चाँद तारों का,,
चाँद उन्मादित सरहद पर, सूरज सनातन अधिकार है लिए ||

धरा तो बंट चुकी पहले हवा औ बरखा को बाँटना बकाया ,,
बम के गोले हाथ उठाये घूमते मिले खुदाई धिक्कार के लिए ||"
--------- विजयलक्ष्मी

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