Wednesday, 23 December 2015

" किसान भूखा नहीं होगा ...उसका निवाला सूखा नहीं होगा ,,"

" पलकों में ख्वाब से ठहरे तुम ..
आंसूं बन न गिर जाना .. 
गिरती रही बबूल पर भी ओस..
बबूल ने भी कब माना ..
चांदनी बिखेरती ठंडी रौशनी..
चकवा गाये विरही गाना ..
जलता रहा सूरज तन्हा-तन्हा
सौंधापन लिए बरसात आना
गगन के सितारे से गुफ्तगू ..
चोरी से छत पर आना ..
रात अमावस देख अंधियारी ..
ओस का गिर जाना ..
रात का काजल आँख में लिए ..
अनजान पथ पर बढ़ जाना ..
दर्द की इक पोटली ..
सरे राह मन गाडी पर लद जाना ..
इंतजार भोर का ..
मुझे भी उसे भी..मगर मंजिल का खो जाना .
कदम कदम फिर दिशा बोध होगा ..
पल्लवित उपवन जाने कब पुष्पित होगा,,
आस भी है विश्वास भी है...अहसास भी है ..
और..इंतजार उस आखिरी लम्हे का
जब सूरज निकलेगा ..
मुस्कान खिलेगी होठो पर
दुःख पोटली बना खो जायेंगे ,,
गम बक्से में बंद हो जायेंगे ...
और..
आँख का समन्दर खाद बनेगा खेतो की
किसान भूखा नहीं होगा ...उसका निवाला सूखा नहीं होगा ,,
न साहूकार उधारी मांगेगा ..
न बेचनी पड़ेगी गाय किसी कसाई के हाथों चंद रुपयों की खातिर
न कोई बाला भय से थरथर कांपेगी ,,
न आजादी होगी किसी अपराधी को ,,
न दर्द उगेगा किसी भी आँख में
और स्वार्थ डूब मरेगा ...ईमान के समन्दर में
जमीर की ऊँची लहरों के बीच "
---- विजयलक्ष्मी

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