Tuesday, 1 December 2015

" कोई सीरत ए लहू की बानगी मानता ही नहीं "

" जिस्म की हैसियत भी इक उपकरण सी हो गयी है आजकल,,
स्वार्थ भरी जिन्दगी के लिए दौलत ए दुनिया को रुसवा किया ||

झूठ बोला तो उसीसे जिसने बोलना सिखाया तेरी जुबान को ,,
बेजार करता है वही दामन तुझे ,,तेरी चोट ने जो फतवा दिया||

बोझ लगना लाजिमी है जर्जर हुयी देह भला किस काम की ,,
बेवकूफी भरे थे फैसले उनके तेरी जरूरत पर स्वास्थ्य लुटवा दिया ||

देंगे क्या बुढापे में खांसकर घर भर को परेशां कर रहे हैं आजकल
गिरवी घर को छुड़ाना फजूल खेत बकाया था कल बिकवा दिया || "
----- विजयलक्ष्मी

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" बताओ ....सुरत ए हाल दिल का क्या लिखूं 
कोई धडकनों के अहसास पहचनता ही नहीं 
नगमे सुने उड़ते हवा में महक का क्या लिखूं
कोई सीरत ए लहू की बानगी मानता ही नहीं "

------ विजयलक्ष्मी

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