Tuesday, 27 January 2015

" जहाँ शब्द पिंजरे से लगते है "

" मैं खुश हूँ ?
मुझसे न पूछ ये सवाल 
ख़ामोशी उगल देगी हर जवाब 
बेहतर है ,,चुप्पी के साथ नाराजगी जाहिर करू 
सत्य बोलना कठिन होता है कभी कभी 
और झूठ आप ही अपनी गवाही देता है
शाम ख़ामोशी से पसर जाती है अँधेरे के आगोश में
चिर निंद्रा से अहसास लिए
जाने क्यूँ लगा मुझे
शांत मुस्कान जैसे ...चिपका दिया हो फूल किसी पौधे की डाली पर
मोनालिसा की तस्वीर का सच ...... कोई क्या जानेगा
जो दीवाना नहीं हुआ .
न ओस न आब ,,न खबर कोई अपनी ,
जीने का तकाजा है जिन्दगी अपनी
जहाँ शब्द पिंजरे से लगते है 
और होता जाता है मौन मुखर
चुप्पी चीखो से इतर ..साल जाता है यूँ खामोश सी ख़ामोशी का खंजर
और नाचती है कविता तब ..शब्दों से निकल
चलती है सवार ह्रदय तरंग अश्वारोहण करवाता क्यूँ है
पलको का इन्तजार बन दरबान निहारता निर्निमेष कोई बचा अवशेष
उड़ जाता गगन की और मिलने क्षितिज की और
बहुत घनघोर ,,,मगर रिमझिम सी लगती बरखा
और सहरा में खड़े भीग जाता है क्यूँ मन
लेकिन प्यास अधूरी तृषित तिसाए से हम क्यूँ आज भी
मंथर सा अहसास बना अंगार दहका जाता जाता है
अगरबत्ती सा मन जलकर भी महका रहता है
और नजर झांकती है जैसे आत्मा के भीतर बैठ परमात्मा ढूढती सी
--- विजयलक्ष्मी 

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