Monday, 26 January 2015

स्वाति बूँद पर,

हाँ ,समन्दर होगा बड़ा ...
घेरे होगा बाहों में धरा 
जल होता है उसका खारा 
मैंने पीकर देखा इक बार 
मेरी प्यास नहीं बुझी ..... और तुम्हारी .... ? -------- विजयलक्ष्मी




पहाड़ी झरने भले ,
कम दूर चले 
मगर जितना भी चले 
मीठे ही रहे 
न रंग बदला न ढंग 
बस उम्र जरा छोटी ठहरी ------ विजयलक्ष्मी



एक चातक 
विकल 
विचर रहा हू 
नभ पर ,
मेरी नजर 
बस
स्वाति बूँद पर --- विजयलक्ष्मी



No comments:

Post a comment