Monday, 26 January 2015

" प्रणाम है इन पर्वतों को ."

" सत्य खरा होता है ,,
कटु होना न होना उसके समानांतर बात है ,
यथा गंगा सबके मेल हर लेती है ..
किन्तु गंगा को गन्दा करने और अस्पर्श्य घोषित करना समानांतर बात है 
पवित्रता मन के भीतर रहती है हाथो में नहीं 
छूने से या खाने से धर्म और मन बदलते तो सभी अस्पर्श्य उच्च हो गये होते
कभी सोचा है ...या बीएस मन में ग्रंथि पाल रखी है तो बस
सत्य के ऊपर दाग लगाने वालो सत्य को जानो
सत्य तो सत्य ही रहेगा ..
बदल गया तो सत्य कैसा ..
यूँभी ,हंसी आती है वंचितों और सन्चितो की अवधारणा पर
अपने मन के मेल साफ करो ..
तन को शुद्ध रखो ,,
पंडित के घर में घूरे का ढेर उसे आदरणीय नहीं बनाता ..
आदरणीय बनता है आचरण ,व्यवहार का व्याकरण
सामान्य जीवन सभी जी सके ..
सत्य तो यही है ....जीवन के साथ ही सत्य असत्य है .
हाँ जन्म सत्य हो अथवा नहीं मृत्यु सत्य है अविजित है ,,
कुछ सत्य समय के अनुसार चलाने वालो ...सत्ता का नशा नहीं अच्छा
सत्ता ..लोग उसी प्रभु को कोसते है जिससे पाते हैं जीवन ,जीवन की कला ,
छलते है उसी जीवन को ...पर्दे डालकर ,
बाहर भीतर के सत्य को सामान्य रास्तो पर दौड़ने दो
जीवन अनमोल है ... कर्म पथ से न हतो न हटाओ किसी को
उजागर सत्य में झांको ,,सूरज की किरण चलती तो समान चल से है ..
मतभेद के ऊँचे पहाड़ धुप से वंचित करते हैं
सूरज की किरण देखि थी जहां वहां खाई बन गयी है ,,
उच्चतम शिखर खड़े हैं मानव मन में
प्रणाम है इन पर्वतों को .
हम धरती पर भले वंचित या संचित जो होगा भुगतेंगे
भूखे मरना है तो भूखे मरेंगे माना तुम आढती ठहरे
खेतो से सामान उठाते हो सारा ..
हम राणा के वंशज लक्ष्मीबाई के पुजारी ..मर भी जायेंगे तो क्या "
-------- विजयलक्ष्मी

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