Tuesday, 27 January 2015

"बंजर जमीं को साँस जैसे मिल गयी हों.."

जिसे जख्म कहा व्ही वजूद है मेरा ..
इसके सिवा मैं खुद भी नहीं मेरा ..----- विजयलक्ष्मी





उसके दर पे हुए सजदे में बस मुझे ही काफ़िर करार मिला 
मैरी पाकीजगी पे यकीन मेरे मोहसिन को ही नहीं .खुदारा ---विजयलक्ष्मी





वो इन्तेहाँ है भरोसे की मुहब्बत पर अमीत
खुद को मापने एक पैमाना हुआ है दिल 
नाज ए हुस्न भी अदा ही समझ एक 
हर हाल बस तेरा ही तलबगार हुआ है दिल --- विजयलक्ष्मी




तसव्वुर की धुप की रौनक तुम क्या जानोगे ,
सर्दियों के मौसम की बानगी का मजा क्या है

अहसास का दुशाला नूर भर गया अन्तस् में
हूँ धुल ही मगर आंधी सा उड़ने में मजा क्या है ---- विजयलक्ष्मी




जमा है किसी बैंक के खाते में 
जमा धन की तरह खत ..
बहुत प्यारे से अहसास भरे है 
दिल में साथ तेरे ये खत ..
इंतज़ार हर घड़ी कि तुम लिखोगे 

ढेर सा इंतज़ार दिए जो खत
आज भी है तसव्वुर में मेरे प्यारे
दुलारे धडकन बने वो खत
.--- विजयलक्ष्मी





भीगे बहुत कल मनभावन सावन की बरसात में ,
लगने लगे हैं खुद को ही नए से जैसे बदल रहे हैं हम 
हों रहा है बारिश का असर अब जान बचती सी नजर आने लगी है 
एक मुस्कुराहट झांकती है बादलों की ओट से ,
और धरा भी सहम कर लजा गयी अपने आप से 

आसमां ने हर तपिश समेट ली आगोश में ...
खो रहे है क्यूँ नयन प्रकृति के उल्लास में ,
छू रही है मलय मन ,आत्मा थिरक उठी नए से अंदाज में ..
अब फसल लहलहाने सी लगी है खेत में ...
बंजर जमीं को साँस जैसे मिल गयी हों..
आईने का सच कहूँ कैसे भला ?हम खुद को उसमे न पा सके ,
रुक जरा सम्भल तो लूं बिखरने लगा है क्यूँ मेरा वजूद ही ,
रंग बिरंगी सी हर डगर लगने लगी ,
महकने लगी है बेला क्यूँ इक ख्वाब सी ...
आदत नहीं है आँख को किसी ख्वाब की, डरते है टूट जाये न .
 

--------------- विजयलक्ष्मी .

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