Saturday, 3 January 2015

" तुमने कौन सा तीर मार लिया ..?"



 " शब्द की खुरपी से उखाड़ती हूँ दिल की जमीं
तुम्हारी यादो की परत को दर्द से सरोबार मत होना
क्या सत्य का सामना कर सकोगे ?
सोच लो , मेरी खुरपी बस खुरपी नहीं नश्तर सी चुभेगी
भीतर तक गहरा जाएगी जब कुरेदने पर आएगी 

एक साल नहीं उससे भी पहली ढकी दबी कितनी खरपतवार उखड़ेगी
अंदाज भी नहीं लगा पाओगे
एक एक परत पपड़ी सी उतरेगी
नकाब उतरता देखा है ,,,या खाल की तरह उतरती फेसपैक की परत
नहीं न ...मत कहना कभी ...
अब तक क्या उखाड़ लिया ,,?
जो जमा ही न हो गहरे ....वो ही ऐसा बोलते हैं ?
कुछ बातो पर मुस्कुराने की इच्छा होती हैं कभी कभी
मेरे शब्द शब्द नहीं जख्म पर नमक का कम करेंगे
तुम्हारे दिल पर उकेरे गये शब्द जो दिल की कलम से लिखते हैं शिलालेख
उन्हें मिटा डालो न
अपनी हालत देखो ,,
आँखों में इंतजार हैं
मन घायल है
अहसास घुमड़ते है उमड़ते हैं
बरसना चाहते हैं मेरे मन की जमी पर
इंतजार ....दुश्मनी ..दर्द ...बंदूक ..लहू
पुष्प की खुशबू नहीं दर्द की महक निखरेगी उन जख्मो में
तुमने कौन सा तीर मार लिया ..
हमारा तीर तो निशने पर है ...बचा सको तो बचा लो
छिपकर निशाना नहीं लगाया कभी ".
----- विजयलक्ष्मी

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