Tuesday, 6 May 2014

" देशभक्तों पर भी अंगुली उठने लगी है आजकल "

कासिद ने खत नहीं भेजा ,,इन्तजार में रहे ,
किस्सा तमाम गोया किस किस से हम कहें .

झूठ को सच बनाने में लगे हैं सियासती बंदे 
झूठ के पाँव नहीं होते किस किस से कहे हम .

विकास औ घोटाले बिखरे हैं चुनावी जमीं पर 
शहादत नहीं जानते हैं किस किस से कहें हम.

उभरी इक इक इबारत, खुला यादों का सन्दूक 
वीराना ए नखलिस्तान किस किस से कहे हम .

देशभक्तों पर भी अंगुली उठने लगी है आजकल
दलालो की तो मत सुनो किस किस से कहे हम
- विजयलक्ष्मी

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