Wednesday, 14 May 2014

" शब्द सयाने हुए कब ... मालूम ही न हुआ "


"किसी को ..शब्द मिलते है खिलखिलाते से 
किसी को ..मिले मुस्कुराकर लजाते से 
किसी को ..मिले आँख से आँख मिलाकर बतियाते से 
किसी को ..मिले सडक पर लावारिस से खड़े 
किसी को ..मिले सुनसान सी सडक पड़े से 
किसी को ..मिले मोती जड़े से 
किसी को ..मिले सर्द मौसम में ठिठुरकर सिकुड़े से 
किसी को ..सुनहली सी धूप की भट्टी में तपते मिले 
किसी को ..खुदी में खुद को जपते से मिले 
किसी को ..जड़े मिले सिले होठो पर 
किसी को ..चिपकते मिले लहुलुहान चोटों पर
किसी को ..दर पर खड़े मिले दया के रंग में
किसी को ..डूबे मिले राजनैतिक ढंग में
कही चिल्ला रहे थे गला फाड़कर ..
चुप हो जाते थे कही मौत को ताड़कर
कही गमगीन गम को गुनगुना रहे थे
कही जिन्दगी का राग सुना रहे थे
कही बेबाक से ..कही बेलाग से
कही बर्फ से जमे ..कही धधकते आग से
कही मौसम से पतझड़ में बसंत हो आया
कही लगते रहे धुप बनी हो छाया
कहीं खंजर कहीं मंजर ...कहीं अनगढ़ कही अनपढ़
कही बददिमाग से ..कहीं फिजूल के राग से
कही सुर से बिंधे ..कहीं गले में रुंधे
कही बिखरे बिखरे ..कही माला से गुंथे
हर रंग हर रूप से ..कहीं भिखारी से कही भूप से
कही बिछड़े हुए टूटे शजर से
कही कठोर पड़े पत्थर से
..जिसने जैसे चाह मरोड़ा ... बे-परवाह होकर निचोड़ा
उठा उठाकर पटका ...कभी मार मारकर फोड़ा
चुपचाप से निरीह देखते रहे ,सहते रहे है सबके विचार ..
नहीं छोड़ा आचरण ..न व्याकरण
रोते गाते रहे ..पल पल साथ निभाते रहे
ये शब्द ..मेरा भी और तुम्हारा भी .
फिर भी सदा शिकायत ही रही सबको ..अधूरेपन की
शब्द सयाने हुए कब ... मालूम ही न हुआ
!!".-- विजयलक्ष्मी

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