Friday, 30 May 2014

" फूलो की चाहत में बसंत उमड़ा था"




आज फिर.. इल्जाम हवा पर आया है ,
दरख्तों ने मलय को तूफ़ान बताया है ||

सूखा रास आता है सहरा को सदा से 
एक बदली बरसात ने सब बहाया है ||

फूलो की चाहत में बसंत उमड़ा था
देखो पतझड़ का इल्जाम लगाया है ||

बंद दरो के पीछे सांकल पर मुहरबंदी 
बरसों पुराना इक सबक याद आया है ||

जब छोड़ना होता है घर वनिता को
घर की कड़ियों में ही साप बताया है ||
-- विजयलक्ष्मी 

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