Saturday, 17 December 2016

" मन की भाषा मन ही जाने "

" मन की भाषा मन ही जाने
मनके अपने खेल निराले
अपने सपने अपने गीत
अपने स्वर संग अपनी प्रीत
अपनी दुनिया अपनी रंगत
अपनी बातें अपनी संगत
अपने विचार अपने विमर्श
अपने रास्ते अपने उत्कर्ष
अपने भाव अपने अनुभाव
अपने अभाव अपने प्रभाव
अपने रंग रास अपने विन्यास
अपने कदमों का विश्वास
अपने निर्झर अपने भाग
अपनी शांति अपनी आग
अपने मौन सुने अब कौन
जीवन हंगामा सरगम मौन
अपनी उम्र के ताने-बाने
कुछ पहचाने कुछ अनजाने
बस प्रस्तर पर जड़ा देखता
रास्तों को जाते खड़ा देखता
मैं और मेरा मन अक्सर
अपने तर्कों से खुदी बेधता
लाठी समय भी चला टेकता
प्रण नया फिर मन में ठान
रखता सूरज सा स्वाभिमान
मनके मनके पर लिखा ,,
मनके मोती का अभिमान
मनका मनका फिरे मापता
दुनियावी मन का भगवान
कैसी अनबूझ बनी पहेली ..
जीवन इक अनजान सहेली
कितना ढूँढू कितना पाऊं
ढूंढ --ढूंढ मन कित कित धाऊँ
फिरते मन को पकड़ न पाऊँ " ---------- विजयलक्ष्मी


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