Monday, 17 November 2014

"बताओ तो,, पुरुष अपनी नसबंदी क्यूँ नहीं करवाता है ?"




" मैं मर रही हूँ 
रोज मरती हूँ 
हर बार अलग तरीके से मारी जाती हूँ 
कभी इज्जत को तार तार करके मारा जाता है कभी जलाया जाता है 
कभी दहेज के नाम पर रसोई में कभी कोख में 
कभी फेरे पर कभी सामाजिक घेरे में
कभी गरीबी हमे मारती है
कभी जरूरत मार डालती है
कभी लडको की चाहत मार डालती है
कभी बीमारी जिन्दा नहीं रहने देती
इस बार तो मुझे बहुत ही अजीब से तरीके से मारा गया
जिसमे कोई नहीं मरते ..
मरता भी कोई कैसे ..पुरुष तो कोई आगे ही नहीं बढ़ता
धकियाया जाता है औरत को सदा से
जानते हो अब लगने लगा है आदमी स्वार्थ के लिए जीता है
हमारा उपयोग करता है उसे हमारी कितनी चिंता है ..
उसका स्वार्थ पूरा तो सब जाये भाड़ में ..क्या कहा ..नहीं एसा नहीं है
तो जोर से चीखकर कहती हूँ एसा ही है ..
छत्तीसगढ़ की खबर सुनी है
अच्छा कितने पुरुषो ने अपना नसबंदी कराया है
मुझे तो सैकड़ो में कोई एक दो भी नहीं पाया है
हर घर से औरत को ही आगे बढ़ाया है
क्यूंकि कमजोर होता है पुरुष ...
पेट में बच्चा मरना हो तो औरत को ,,
बच्चा पैदा न करना हो तो औरत को
हर लड़ाई में औरत को ढाल बनाते है फिर भी पुरुष पुराण ही बनाये गाये जाते हैं
हर बंधन औरत पर आजादी पुरुष को ..लेकिन
मौत की और औरत के कदम ही पहले पाए जाते है
और आज उसी अभियान में
जनसंख्या नियन्त्रण के काम में
औरत ही खेत रही है ...जिन्दगी उसे ही रेत रही है
हर विभाग का उत्तरदायित्व पुरुष पर सिर्फ मौत को छोडकर
मुझे ये भी पता है मेरे मरते ही दूसरी आ जाएगी
मेरी मुहब्बत की चादर उसके काम आएगी
तुमने जनसंख्या नियन्त्रण में हिस्सा ही कब लिया था
तुम्हे तो बस बढ़ाना आता है
अपनी संतुष्टि के लिए देह का देह से रास रचाना भाता है
बताओ तो ...पुरुष नसबंदी अपनी क्यूँ नहीं करवाता है ?
बताओ तो.... पुरुष अपनी नसबंदी क्यूँ नहीं करवाता है ?"
---- विजयलक्ष्मी

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