Friday, 14 November 2014

" बालदिवस की सार्थकता का वो एक दिन ..."



"नौनिहालों को मुबारक बालदिवस |"

हमारे देश में एक चाचा हुए है ...चाचियो की गिनती अभी तक तय नहीं हो पायी मरने के अनेक वर्षो के बाद भी ..लेकिन ...सुना है बच्चो से भी बहुत प्यार था लेकिन कौन से बच्चो से नहीं मालूम ...कब किस बच्चे के लिए क्या किया याद नहीं पड़ता ..हाँ भारत माँ के बच्चो को बंटवारे का दंश और सरहद का झगड़ा रह रहकर सताता है ...सत्ता पर वो आज भी काबिज है मरने के कई दशको के बाद भी ...मोह नहीं छुट रहा ... एक गुलाब जो अचकन पर लगाते थे आज लगता है जैसे देश के जमीर को तोडकर टांक लिया हो ...एक पप्पू भी है उनके घर में जाने क्यूँ बेवक्त चिल्लाता है ,,उसे मालूम ही नहीं रहता गुस्से का कोई वाजिब कारण भी होना चाहिए ....हाँ पप्पू को अंग्रेजी का कुछ ज्यादा ही शौक है ...और हिंदी से तो जैसे दुश्मनी है उसे .....कमाल करते हो आपनी माँ गाँव की है तो दुसरे की माँ को घर में बुलाओगे क्या लोगो से मिलाने के लिए माँ बनाकर ..देश की तरक्की अंग्रेजी से जुडी है विदेशियों से बात नहीं कर सकते ....हद है न खुद का कड़ बढाओ भई ......दुसरे की लल्लोचप्पो क्यूँ ...आखिर लहू लहू को पुकारता है ..चाचा एडविना को पुकारते थे पप्पू अंग्रेजी को ,, उनके बड़े में लक्ष्मीबाई की सहायता न करने वाले सिंधिया जैसे खानदानी लोग रहे है सदा .. ये गयासुद्दीन कौन थे किसी को मालूम हो तो बताना ..गजोधर कब और कैसे बने कुछ याद नहीं पड़ता ...असल में इतिहास कमजोर रहा है अपना ,,,निन्यानवे के फेर का गणित सीखते रहे और इतिहास पीछे छुट गया ....किताबो से भी बाहर निकल गया ,,जो बचा आजाद भगत को आतंकवादी बनाने की तयारी करता मिला ..उनके बच्चो को भाई भतीजे को किसी ने बालदिवस की मुबारकबाद कब दी याद नहीं पड़ रहा ..

....लूटने वालो के लिए संग्रहालय घड दिए शिलालेख से ,
...जो लुट गये उनकी कब्र पर दीपक जलाने भी नहीं आया कोई
...भूलकर तहजीब हिन्दुस्तान की तख्त ए ताउस पर बैठा किये
...जिन्दा कौम को सही रास्ता दिखाने भी नहीं आया कोई
..हर बच्चा ..वो छोटू हुआ किसी भी कोने में देश के ..गरीब था
..गरीबी और जहालत की जिन्दगी , फरिश्ता बचाने आया नहीं कोई
..न शिक्षा के पैमाने निर्धारित न इम्तेहानो का कायदा
..मछली के प्रायोगिक प्रश्नपत्र में पेड़ पर चढना लिखा ?,,प्रश्न बदलवाने आया नहीं कोई
..बालदिवस शुभ हो मंगलकामना करने का मन है बहुत मेरा
..नौनिहालों को जीना सिखाने का सलीका बताने आया नहीं कोई" ---- विजयलक्ष्मी





"एक दिन का विमर्श काफी नहीं नौनिहालों को 
हर बच्चा सुरक्षा औ मुस्कान मांगता है 


कूड़े के ढेर में ढूंढता रहा जिन्दगी दिनभर 
रात को तो वो पेट भी रोटी भरपेट मांगता है


वंशावली जिनकी सियासत करती रही 

देश उनसे भी तो वाजिब जवाब मांगता है 


बाँट दिया तुमने माँ भारती के बच्चो को धर्म में
उतारकर सत्ता से हिसाब जांचता है 


इस्लाम में तो सेकुलर अल्फाज नदारत
जिस वेद में लिखा किताब मांगता है 


नौटंकी करनी बंद करो पुरखो के नाम पर
तुम्हारी रग रग को हिंदुस्तान जानता है
"--- विजयलक्ष्मी


बालदिवस की सार्थकता का वो एक दिन ... 

" घर से दो घर आगे अक्सर दिखाई देती थी
दोपहर से शाम तक वही घर ठिकाना था उन दिनों उसका
वो चार बहने एक भाई गिनती में पांच लोग 
छोटी सी उम्र में घर के सब कम इस तरह करती थी भूखे रहने की नौबत न आये
बर्तन चौका तो कुछ ऐसे जैसे भले घर की लडकिया गुडिया से खेलती हो
बाप मर खप गया शराब की आन पर भेट चढ़ गया ..
पढने का शौक ही होगा या समझ उसकी ..
दुसरे के घर में झाड़ू बर्तन करने शुरू हुए .
किताब कॉपी भी मिलने लगी ..पिछले बीते सालो की ..
जो पहले भी पढ़ी जा चुकी थी कई बार
उम्र के जिस पड़ाव पर माँ का दामन पकडकर चलना सीखती है अक्सर लडकियाँ
डरती है माँ ...घर से बाहर निकलने के नाम पर ,,
वो लौटती थी उसी उम्र और उसी वक्त पर घर की और
माँ भी हिम्मत रहते काम करती रही..लेकिन ....
वक्त की तलवार ने उसे छीलने की तयारी कर ली थी शायद
शरीर रोगों की खान हो गया तो घर से निकलना मजबूरी होता है उन बेटियों की जो झुग्गी में रहती है बिन बाप के
उसने पास की दुकान में अनाज फटकने का कम पकड़ लिया दमे के बावजूद ...
भाई साईकिल पर पंचर लगाने का काम करने लगा स्कूल के बाद
रोटी और कपड़े के आलावा फीस का इंतजाम भी जरूरी था
लगन देखकर कुछ हाथ मदद को उठने लगे ,,
कच्ची उम्र की देहलीज क्या होती है सामने से गुजरने वाले की नजर बताती है उन्हें
नहीं मालूम कितने खरीदने की सोचते होंगे फीस के बदले
समय की कमी ट्यूशन के लिए वक्त और पैसे का खर्चा
ऐसे में बिन पैसे लिए पढाने की तमन्ना बलवती हुई
नजरे पढने की जरूरत भी खत्म हो गयी थी उसे ..किसी का पास से गुजरना भर उसके इरादे हाथ में पकड़ा देता था उसके
मेरे घर आनाजाना होने लगा उसका ..कभी सबके साथ कभी अलग
एक दर बंद हो तो दर और भी खुल जाते हैं ...स्कूली अध्यापक सभी न अच्छे होते है न बुरे
लेकिन ..
क्या करे हर कोई पेट के लिए मेहनत कर रहा है ..
किसी का पेट कभी नहीं भरता कोई मिलबांट कर खाकर भी खुश रहता है ..
धीरे धीरे वक्त गुजरा ...स्कूली शिक्षा कोलेज के मुहाने पहुंची ...
आज बालदिवस है न याद आ गया वो चेहरा ... बारहवी के रिजल्ट पर जब मुस्कुराया था .
कई बरस बीत गये अब तो ...पर सार्थकता ढूंढ ही ली कई बार .
बहुत तो नहीं बस एक चेहरा भी मुस्कुरा उठे तो ..सार्थक हुआ दिन |
"-- विजयलक्ष्मी 

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