Wednesday, 27 January 2016

" वोट की रोटी तो सिकेंगी ही स्वार्थी भूख जबर्दस्त है"

" सत्य को सत्य लिखिए...कलम को न तोडिये ,,
शब्दों की भावना को भी यथार्थ से तो जोडिये "
------- विजयलक्ष्मी


" ये सियासत ए इश्क बड़ा बेमिसाल औ बदबख्त है
वोट की रोटी तो सिकेंगी ही स्वार्थी भूख जबर्दस्त है " ---- विजयलक्ष्मी



" मुझे भी जीने का हक है या नहीं ,,
मेरे घर में ही मैं हुआ पराया ..
तिलक माथे मैंने क्या धारा ...मिशनरी स्कूल बोला बाहर निकलो,,
मेरी कलाई पर राखी किसी दरुम ए उलूम को नहीं भायी
मेरे देश के तिरंगे को लहराने को भी न्यायालय को हुकुम देना पड़ता है,,
फिर भी हुकुम-उदूली क्यूँ करता है,,
इक अखलाख मरा तो आंसूं की बाढ़ समन्दर ले आई
मालदा में गिरा लहू क्या हिन्दुस्तानी नहीं था
आसाम में किसने लूटी इज्जत किसने कत्ल किये थे और जलाये घर
एक सैनिक को मारा टक्कर से कोई न हुई गिरफ्तारी ..
पुजारी के हाथ कटे ,,मैं मेरे घर में बाहर का बन्दा हुआ ,,
बिका हुआ मिडिया मेरे मामले में निपट अँधा हुआ ,,
जुलुस निकले त्रिपाठी के विरोध में..मरेकितने मासूम ?कोई फूटी आँख बोला
दर्द मेरे वतन का बताओ किसने खिलाफत में मुह खोला
एक कहानी हो तो विश्वास करूं ...वरना बतलाओ झूठी नफरत भरी बातों को कहाँ दफन करूं
सब वोट का धंधा भैया......और दौलत की लात,,
धर्म मेरा सच्चा और करता मानवता की बात ,,
मेरी वेदना मेरे घर में परायापन देने लगे हैं लोग..
कुछ जयचंदों की करनी चढा गयी हमे दुविधा की भेंट ..
तुम देश के सच्चे सपूत ...वंदेमातरम् बोलो ..
चूमो धरती के मस्तक को ,,वतन की जय बोलो ,,
आतंकी को करो खबरदार.....करो निकाल बाहर ,,
उनसे रिश्ते तोड़ो .....खुद को सद्भावना से जोड़ो
शब्दों से नहीं ह्रदय में बहते लहू में वतन को उतार लो
दुश्मन जो देखे आँख उठाकर उसे अंतिम घाट उतार दो,,
आवाज करो बुलंद ..तिरंगा प्यारा है,,
जय भारत ,,माँ भारती का हर सपूत हमको प्यारा है" --------- विजयलक्ष्मी


" दर्द ए नूर भी वही अपना इश्क ए हुजुर भी वही ,,
शक्ल है कि इबादतगाह, बज्म ए गुरुर भी वही "---- विजयलक्ष्मी

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