Saturday, 9 January 2016

" जिंदगी की महाभारत का हश्र बकाया है "

" मेरे सत्य और तुम्हारे सत्य में कितना अंतर है
अंतर ही होता कोई बात न थी 
यहाँ तो जिंदगी मौत का फासला है
मैं , मैं कहाँ हूँ
मैं, दम्भ ...झूठ में छिपा सत्य का मुलम्मा हूँ
सत्य की धार को कुंद करता शिफारिश का पुलिंदा हूँ
विश्वास नहीं होता गर
देखो डॉक्टरी जाँच में
देखो भटके इतिहासकारों की किताब में
देखो महाजनी काज में
देखो किसान के सूखे खेत में
देखो बहती नदी तट की रेत में
देखो मास्टरी मायाजाल में
देखो नेताओं की चाल में
देखो रिश्वतखोरी के माल में
देखो बिक्रीत कलम में
देखो बहकते सम्भलते कदम में
और सत्य मर रहा है
घुट रहा है
कराह रहा है
जिंदगी की महाभारत का हश्र बकाया है "
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---------- विजयलक्ष्मी

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