Tuesday, 9 February 2016

" कागज की कश्ती इश्क ए नाखुदा को मुद्दतें "


वो इक गुलाब था या काँटा बबूल का ,,
दर्द ए इन्तेहाँ सफर बेवफाई कबूल था ||
जिन्दगी में खफा मौत से किये जुस्तजू
आरजू ए दर्द औ बा-वफाई मशहूर था ||
------- विजयलक्ष्मी




" यूँ अमावस है ठहरी हुई रौशनी को मुद्दते,
न चाँद दिखा गगन में चांदनी को मुद्दतें ||

लगी आग जब , जली चौखटों को मुद्दतें ,
ढूंढते फिरते कहाँ दबी चिंगारी को मुद्दतें ||

इम्तेहान ए वफा यूँ,रही दरकार को मुद्दतें,
पैरहन कैसी कैसी ,यूँ जिंदगानी को मुद्दतें ||

इक चकोरी ढूंढती मिली चकोर को मुद्दतें ,
होश औ हवास बेखबर,इंतजारी को मुद्दतें ||

सलामी दूं किसे मैं यूँ इल्जामात को मुद्दतें,
यूँ बढ़ते कदम औ राह ए रवानी को मुद्दतें ||

कागज की कश्ती इश्क ए नाखुदा को मुद्दतें
ख़ाक ए नजर मिली मेरी गुमनामी को मुद्दतें ||" 

-------- विजयलक्ष्मी

No comments:

Post a comment