Monday, 23 March 2015

"मैं औरत .... मधुमक्खी बन जाती "



" मैं , औरत ..

गर स्वभाव से...
 मधुमक्खी बन जाती 
उसी ताल पर ..
गर प्रभाव से ..
अपना अलग समाज बनाती 
जनती इक्का दुक्का पुरुष ही ,,
गर अपने हिसाब से .. 
अपनी ही वंशबेल बढाती ,
बढ़े न कोई और समस्या 
गर मनमुटाव से ..
मधुमक्खी जैसे ही उसे मारती औ खा जाती 
अपना जीवन आप चलाती 
गर टकराव से ...
अपनी सेना ,अपना धर्म बनाती ..
अपना ही बस रंग जमाती
गर जमाव से ..
बना शहद सी मीठी दुनिया ...इस दुनिया से छुट जाती 
" फिर कोई पुरुष न कहता ..
जितने भी स्त्री पुरुष है जिनसे समाज बना है
उन्हें औरत ने जना है "
औरत की यूँ दुर्गति न होती 
सम्भवतया इससे तो बेहतर जिन्दगी होती ..क्यूंकि 
जिस औरत ने जन्म संग अधिकार दिया 
उसी पुरुष ने उसी औरत को बाजार दिया "
 ----- विजयलक्ष्मी


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