Friday, 20 March 2015

" भारतीय नववर्ष की शुभ एवं मंगलकामनाओ के साथ ...शुभ नवरात्र "

आपको नवसम्वत्सर की शुभ एवं मंगलकामना ..
.ईश्वरीय आशीष और स्वत:स्फुरित ज्ञान में वृद्धि हेतु कामना सहित ..
हर कदम मंजिल और भी नजदीक हो .--- विजयलक्ष्मी



जय भवानी !
धर ले विकराल रूप माँ !
जय काली कपालिनी असुर विनाशिनी माँ !
हर लो कष्ट कृपामयी तुम ,पाप नाशिनी माँ !
कर दे उद्धार माँ ,हो जाये बेडा पर माँ !

हे सिंह वाहिनी माँ !
हे दर्प विनाशिनी माँ !
जगदम्बा जग जननी मैया ..
हे कल्याणी ,हे भवदुःख हरिणी माँ !
हे मुक्ति दायिनी ,जय भवानी माँ !
तुही दुनिया से तार माँ ,दुष्टों का कर संहार माँ !
भक्तों से करलो प्यार माँ पाए तेरा दुलार माँ !
-- विजयलक्ष्मी




नव वर्ष नववृन्द 
नवगीत नवछ्न्द
रागिनी गाते पक्षीवृन्द 
क्या भोर का सूरज सचमुच मे सुबह लायेगा 
क्या भोर का उजाला जीवन में उजाला लाएगा 
क्या भोर का सूरज भविष्य के माथे पर सज पायेगा
क्या खौफ निगाहों का रूठ जायेगा
क्या वक्त वक्त की सरगम पर लहराएगा
क्या इन्साफ का झंडा फैहरायेगा
नववर्ष नवजीवन लायेगा
उम्मीद की किरण कोई दिखायेगा
--- विजयलक्ष्मी 





हे कृपाण धरिणी !शत्रु विनाशिनी !
हिंसा विदारिणी ,हे सुरेश्वरी देवी !
रक्ष कवच दायिनी ,रौद्र रूपा धारिणी !
माँ कालिके मयूराक्षी !हे भय विनाशिनी !
हे शत्रु हन्ता माँ !हे दुर्मति हारिणी !
हे भवानी ! मोक्ष दायिनी माँ ,हे दर्प हरिणी !...
हे महिषासुर मर्दिनी !हे काल नाशिनी !
हे मुंड माल धारिणी! हे जगतजननी माँ कपालिनी !
हे भवानी प्रसन्न भव ,रोग विनाशिनी !
हे कालिके ! जगदम्बिका माँ कष्ट निवारिणी !
हे मर्दिनी ! हे जगदीश्वरी !हे सौंदर्य स्वरूपा माँ ,हे जीवन दायिनी !.
- विजयलक्ष्मी




" निशुम्भ शुम्भ गर्जनी, प्रचन्ड मुण्डखण्डिनी।
वने रणे प्रकाशिनी, भजामि विन्ध्यवासिनी।।

त्रिशूल मुण्ड धारिणी, धराविघात हारिणी।
गृहे-गृहे निवासिनी, भजामि विन्ध्यवासिनी।।

दारिद्र दुःख हारिणी, सदा विभूति कारिणी।
वियोग शोक हारिणी, भजामि विन्ध्यवासिनी।।

लसत्सुलोल लोचनम् लतासनम वरम प्रदम्।
कपाल-शूल धारिणी, भजामि विन्ध्यवासिनी।।

करौ मुदा गदा धरा , शिवाशिवम् प्रदायिनी।
वरा-वरानना शुभम् भजामि विन्ध्यवासिनी।।

ऋषिन्द्र जामिनीप्रदम्, त्रिधा स्वरूप धारिणी।
जले-थले निवासिनी, भजामि विन्ध्यवासिनी।।

विशिष्ट शिष्ट कारिणी, विशाल रूप धारिणी।
महोदरे विलासिनी, भजामि विन्ध्यवासिनी।।

पुरन्दरादि सेविताम्, सुरारिवंशखण्डिताम्‌।
विशुद्ध बुद्धिकारिणीम्, भजामि विन्ध्यवासिनी।।"

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