Friday, 19 December 2014

" साहित्य तो साहित्यकार लिखते हैं "

" हम मन का उबाल लिखते है ,
जीवन का अंधकार लिखते है
दुनियावी व्यापर लिखते हैं
वतन की ललकार लिखते हैं
साहित्य तो साहित्यकार लिखते हैं


हम तो दर्द लिखते हैं
पहाड़ो पर जमी बर्फ लिखते है
दिल की जमी पर जमे हर्फ लिखते हैं
इंसा कमजर्फ लिखते है
कब वक्त को बना थानेदार लिखते हैं
साहित्य तो साहित्यकार लिखते हैं

हमारा क्या कुछ शब्द उकेरते हैं
दिल के कुछ जख्म उधेड़ते है
व्यर्थ के कुछ मौसमी राग छेड़ते हैं
न मिले अपना तो उधार लिखते है
साहित्य तो साहित्यकार लिखते हैं

बच्चो की गिल्ली डंडा लिखते हैं
परीक्षाफल में बैठा अंडा लिखते है
छब्बीस जनवरी का झंडा लिखते हैं
कभी ताजमहल तो कभी कुतुबमीनार लिखते हैं
साहित्य तो साहित्यकार लिखते हैं

चूल्हे पर पकती भूख लिखते है
सरकार औ साहूकार का झूठ लिखते हैं
बंदूक में लगी लकड़ी को मूठ लिखते हैं
छाती छलनी करती बंदूक लिखते हैं
हमकलम के किस्से सिलसिलेवार लिखते हैं
साहित्य तो साहित्यकार लिखते हैं

हम पीड़ा मन की लिखते हैं
बिमारी समाजिक तन की लिखते हैं
मुश्किले जीवन की लिखते हैं
इंसा का बनाया बाजार लिखते हैं
साहित्य तो साहित्यकार लिखते हैं "
----- विजयलक्ष्मी

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