Thursday, 18 June 2015

" भीग रहे हैं भीतर बाहर इन्द्रधनुषी रंग में "


मधुर मदिर मनोहर लालित्य रंग ढंग में ,,
भीग रहे हैं भीतर बाहर इन्द्रधनुषी रंग में
--- विजयलक्ष्मी


उफ़ !
इतनी तेज धडकन 
महसूस हुयी 
एकबार ही 
और तूफान 
नहीं
झंझा था
हिला गया झकझोर कर
शांत करो खुद को
अभी वक्त नहीं आया
ठहरो ..
यही हूँ मैं ..
सामने ..
तुम्हारे
हमेशा की तरह
बस
एक बार मुस्कुरा दो
!!------- विजयलक्ष्मी



2.
वक्त की रागिनी बजी 
माधुरी सी बांसुरी गुनी 
स्वर उठेंगे गूंज 
तट पर नहीं 
लहरों के उपर 
अथाह बिखरे रंग
सूरज डूबता सा
दिन टूटता सा
अहसास के मोती लिए
जब क्षितिज गगन
एकाकार हुए थे
कागा गा उठा पंचम सुर
कोयल हक्लाती बोल उठी
उफ़ !
सूरज क्यूँ पूरब में डूबा
और धरती गहरा उठी
सूरज को न पा ..
मनुहरिन और पुजारिन
ये क्या ..
मृत्यु शैया .
नहीं ...
शांत जीवन ..
निष्णात अंत
उद्विग्नता का समापन
नफरत और ईर्ष्या से दूरी
सिर्फ "तुम "
आजादी भी है
मुहब्बत भी है
मालूम है हम केंद्र है एक दुसरे के
और
तुम
कदाचित चिंतित हो
निवारण हो जायेगा
मुस्कुराहट उभरेगी
रहस्य ...नहीं
प्रेमरस है
जिसे पीकर ...
जिन्दा हो जाउंगी
सदा के लिए
साथ दूंगी तुम्हारा
रम जाउंगी
आत्मा के उसी छोर
मैं !!
लगाते हो आवाज
जहा से ..
तुम .
------- विजयलक्ष्मी

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