Wednesday, 17 June 2015

" क्या इन्तजार पूरा होगा "

क्या इन्तजार पूरा होगा 
क्या जिन्दगी लौटेगी कभी फिर से 
क्या सूरज चमकेगा मुंडेर पर मेरी 
क्या इबादत मेरी रंग लाएगी
क्या इन्कलाब की हद तक वफा जाएगी 
क्या सूरज की चमक चांदनी मुझे बनाएगी
क्या पुहप की खुशबू रंग लाएगी
क्या बीतेगी काली नागिन सी रात
क्या उगेगा जीवन में बोया जो राग
क्या यूँही जलायेगी ये आग
क्या बन्दगी ईमान बन पायेगी
क्या रागिनी कोई वतन के राग को गुनगुनायेगी
क्या मुकम्मल से दिन ...राष्ट्रिय गौरव महकाएगी
क्या इल्जाम माथे के धुलेंगे कभी
क्या मानवता जिन्दा रह पायेगी
क्या खेत की भूख किसानों को बचाएगी
इन्सान इन्सान को डस रहा ,,ईमान साप का इंसानों में बस रहा
जहर ही जहर को मारेगा कैसे ,,
विज्ञानं बहुत दूर है इंसानी जेहन से
दिमाग में उठने वाले तूफ़ान से ,बदले की आग से
भीतर स्वार्थ की आग से जले फूंके गुबार से
क्रोध में उठते शेषनाग के पाश से
ईमान सुलगा है मगर धोखा जन्म ले चुका है
जबर्दस्त जबरदस्ती लिए बंदूक मौत को निगल चुका
पाप पूण्य खिलौने हो गये
देख लो इन्सान कितने सयाने हो गये
स्वार्थ के लिए कोई भी ढंग अपना सकते है
आज रावण बहुत है गधे को बाप बना सकते हैं
श्रवण कुमार इक्का दुक्का कोई होगा ,,शायद
इसीलिए धरा का वर्चस्व बाकी है
हर गिलास में नशा हर हाथ में साकी है
किसी को दौलत का किसी अहकार स्वत्व का है
हम नादाँ भी इस दुनिया के मगर जाने क्यूँ हमे अपनत्व का है
कोई जीवन धन को समझ रहा
कोई बेमतलब धर्म को रगड़ रहा
कोई भक्ति के दिखावा कर गंगा नहा रहा
कितना मुर्ख है व्यर्थ में बतंगड बना रहा
नग्नता का बोलबाला है
छिछोरे हुए संस्कार ,,शब्द कांटे बन गये
सत्य को मार कर झूठ के पराठे बन गये
इसी रोग में मरे हुए भी जिन्दा है
जितने जिन्दा है हकीकत में वही शर्मिंदा है
पूछ लो खुद से खुदी के भीतर झांककर
मालूम है कहोगे पहले खुद को भी देख लो आंककर
अपने भीतर झांकर देखूं भी क्या भला
मैं मुर्दा हूँ ,,गीली सी कब्र में जज्बात बिखरे है
सुनो ,ये मत पूछना मुझसे ..लम्हे अकेलेपन के क्यूँ अखरे हैं .--- विजयलक्ष्मी

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