Friday, 19 June 2015

"खेत में उगती मिलिती है फांसी वाली रस्सी "



सूरज जर्द हो गया था 
खो जाती है उसकी लालिमा आँखों में उतरने से पहले 
साँझ भी देर से होने लगी है जैसे इन्तजार लम्बा हो गया हो 
और काम का बोझ बढ़ता जा रहा है 
सूरज भी सोचता होगा साँझ के पहलू से रात उजागर हो 
कुछ समय तो मिले रात के साथ चैन से बैठने का दो घड़ी भर
दिन की तपिश और काम की मारामारी आजकल चैन नहीं लेने देती
सब सर्दी में मांगते है सूरज को ,,और बरसात की कीचड़ से उबकर सुहाता है सूरज
हवा भी सूरज से मिलकर उसे क्या समझाती और ताव खाने लगती है आजकल
इन सबसे आगे बढकर धरती ने भी गर्मी से इतनी दोस्ती बढ़ा ली जैसे रिश्तेदारी हो पिछले जन्म की कोई
हे भगवान ,,जाने कब उबलते मौसम में बरसात होगी
जाने कब खेत में हरियाली आएगी
पर किससे कहूँ मन की व्यथा
आजकल खेत उगा रहे है कर्जा
खेत में उगती मिलिती है फांसी वाली रस्सी
और जिन्दगी का धोखा
बसंत की राह में तो मुश्किले बहुत है
----- विजयलक्ष्मी

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