Saturday, 27 June 2015

" ये कैसा पागलपन लडकियों का ,"

" ये कैसा पागलपन लडकियों का ,,
यही सोचते हैं न सब ,,सबकुछ लुटाकर भी चैन से जी लेती है 
नहीं जानता कोई भीतर भीतर कितना रो लेती हैं 
कुछ न पाकर भी जिन्दगी स्वर्ग बनाती है 
डांट भी खा लेती है और पिटाई भी फिर भी चुप रहती है 
अपने हिस्से का खाना भाई को देकर भी खुश हो लेती है 
जन्म देने वालों के लिए पराई ,,पराये घर को जाकर परनाई
तुमने धान की फसल देखी है ,,जिसे रोप दिया जाता है दूसरे  खेत में लेजाकर 

लडकी नाम की पौध तो दुसरे के खेत में रोपी जाती है ...
लहलहाती है खुशबू बिखरती है और बांटती है खुशियाँ ,,
कभी लडके भी रोपकर देखें हैं ?
लडकों को क्यूँ नहीं भेजा जाता ..कभी सोचकर देखना ..
शायद वो इस लायक ही नहीं है किसी को सम्पूर्णता से अपना सके
किसी गैर को बिना स्वार्थ खुद को न्यौछावर कर सके ,
न धर्म न भावना ,,बस निरा स्वार्थ ,,
बेढंगी बदरंग दुनिया बनाने के माहिर होते हैं लडके
रोटी कपड़ा अपने स्वार्थ हुए पूरे तो ख़ुशी मिलती है ,,
अपने मन के चलते अँधेरे में अपनी बहन की भी चुन्नी खींच लेते हैं लडके
अलमारी में रखी चुन्नी देखकर भी चुप रहती है ,,,भाई के गुनाहों पर माफ़ी मांगकर रो लेती है
क्या करे ...पिता का कर्ज और बेटी का फर्ज याद रखती है लडकी ,
पराई होकर भी जीवन भर आँखों में सजाती है खुशियों की दुआए
दुनिया को बसाने को धरती बनाई वो भी लडकी ,
जीवन चलता रहे सांस चलती रहे हवा बनाई वो भी लडकी ,
सांस भी बनाई तो भी लडकी ,,
लडकी के अहसास पुरुष में जगाना चाहता है उपरवाला शायद ,
शायद उसका अपनत्व का पागलपन ही दुनिया को मुक्कमल करता है ,,
खत्म हो जाएगी लडकी के बिन सृष्टि सारी
इसीलिए ईश्वर भी लडकी बनानी बंद नहीं करता है
"------- विजयलक्ष्मी

No comments:

Post a comment