Monday, 7 September 2015

" सूर्य की प्रथम किरण सी उम्र "




" उम्र ,
कौन सी ..
तन्हा या साथ 
लिए बुढापा या बचपन की सौगात
या साल दर साल पीले पड़ते झड़ते पत्तो का साथ
सच कहना या फिर..दुनियावी नयनो देखी सुनी बात
इक उम्र
कितने बरस कितने महीने
गिनो तो मिनटों और पलो में
जन्म के छोर से चलकर..या उससे भी पहले
प्रथम अहसास के मीठे कोने से,
वृक्ष के पत्तों सी बीत रही ,,
पीले झड़ते वसंत को पार करती मुस्कुराई थी मुझपर
मेरी होकर भी मेरी नहीं थी ..
बंटी हुई सी..
यादों में ,, औ बातों में
दिन से गुजर अँधेरी रातों में
अहसासों में गिनोगे या सांसो में
बीतती बातों में या दिल पर होती आघातों में
या उन शब्दों के खामोश पड़े प्राचीरों से..
काँटों जैसी फूलों की टुकड़ी सोच यूँही मुस्काती है ,,
स्वर्ग नर्क सी यादो को उम्र में गिनवाती है
एक उम्र बर्फ में दबकर बीती ..एक योग तपस्या में दर बैठी
भावनाओ के भूगोल में नदी बहती थी,,
इतिहास मन के गलियारे में युद्धबंदी से सोच रहे ,,
उम्र अपनी लिखूं तो लिखूं कैसे
अपने लिए न ख्वाब बुने न उम्र बुनी
बस ख्यालों की ऊन से बुनती रहती है जिन्दगी खुद को
अंधेरो में रौशनी का इंतजार ..उम्र ही अँधेरे की
खिलती किरण मुस्काती किरण
जिन्दगी को उम्र दे जाती किरण
और एक उम्र मुस्कुरा उठी अंतर्मन की
सूर्य की प्रथम किरण सी उम्र
" ---- विजयलक्ष्मी

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