Friday, 4 September 2015

" जो पांव धरे वतन की धरती पर दुश्मन को छलनी करके रहते हैं "

न रंग मेहँदी का चढ़ा हथेली लाल क्यूँकर है ?
लिखी तहरीर शमशीरीं बनी जाल क्यूँकर है ?
बिकती नारियां देखी मानुष कंगाल क्यूँकर है ?
जले नदिया सा मन बरसे बरसात क्यूँकर है ?
सीता वनवास जाए, द्रोपदी बेहाल क्यूँकर है ?
जवाब उत्तरा मांगे किससे मरा सुहाग क्यूँकर है ?
समाज सभ्य होता गर..न जरूरत थी बताने की....
बेटा चाहिए सबको कन्या भ्रूणहत्या पाप क्यूँकर है ?
---- विजयलक्ष्मी


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" हम भारतीय अहिंसावादी हिंसा में यूंतो विश्वास नहीं करते हैं,
लेकिन मात्रभूमि हित धर्म पालते हाथ पर हाथ नहीं धरते हैं.
ये अलग सी बात है हम सभी शांतिप्रिय झगड़े से दूर रहते है 
उन्हें नहीं छोड़ते जा पहुंचे पाताल में भी, मद में चूर रहते हैं .
यूंतो हम प्रेम के गीत सलौने सुंदर हर पल गुनगुनाते रहते हैं

ठान ले गर नफरत फैलाने वाले को सबक सिखाकर रहते हैं .
खौफ तूफ़ा का नहीं जज्ब किये जज्बात चट्टान से ठहरे हैं .
इक रंग सुनहरा सा ओढ़े यादों का दीप बनकर जलते रहते हैं
उजड़ते बसते अहसासों की दुनिया दुल्हन सा सजते रहते हैं,
जो नजर करे टेड़ी दुश्मन की छाती पर शमशीर धरते हैं
जो पांव धरे वतन की धरती पर दुश्मन को छलनी करके रहते हैं
"---- विजयलक्ष्मी

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