Friday, 4 September 2015

" कृष्ण जन्माष्टमी मंगलमय हो "


" हे पार्थ उठो ,
बहुत सो चुके तुम ,
मैं कृष्ण ,बिराजता हूँ तुम्हारे भीतर ,
कर्तव्य की रणभेरी बजाओ .
शब्दों को गुजार करो ,
शंखनाद करो ,
आह्वान करो नित नये प्रकाश को
जागो ,,
भोर का सूरज बनो
प्रकाशित करो ..जन जन के मन को
तुम्हे अपने भीतर के भय को भगाना है
फैले अंधकार से लड़ना है
जीवन हवनकुंड बनाओ
कर्तव्य की आहुति
और स्नेह घृत के साथ
है पार्थ विराजता तुममे
खुद को बजाओ
आत्मा को जगाओ ..आर्तनाद नहीं शंखनाद करो
उठो ,
जीवन नैया का तुम्हे ही खिवैया बनना है तुम्हे ही पतवार ,
उठो इसबार ..
धारो अवतार ..हे भद्रे ..
मैं कर्तव्य प्रेम से जागृत होता हूँ
तुम्हारे भीतर निवास करता हूँ ,
तुम कृष्ण हो कृष्णमय हो जाओ
जागो ,भ्रमित मत हो
ज्न्माओ मुझे ..
मठ मन्दिरों में नहीं ..
अपने अंदर ,
अपनी आत्मा में
अपने अंतर्मन में
गुंजित करो मुझे
तभी मैं पूजित हो सकूंगा
मैं रथ सारथि हूँ
गांडीव तुम्हे उठाना होगा
" --- विजयलक्ष्मी 





कृष्ण जन्म ...मतलब भादो का महिना कृष्ण पक्ष अष्टमी...और सांवरे सलौने कान्हा जी का जन्म.. कृष्णजन्माष्टमी हिन्दू धर्म के सभी मतावलम्बी मनाते है...चाहे वो शैव हो या शाक्त ...वैष्णव को विशेषकर बहुत धूम मची रहती है आजकल मटकी का चलन बहुत बढ़ गया...कुछ लोग तो तो स्वयम को कृष्ण का अवतार ही नहीं साक्षात् स्वरूप मानते है....इसीलिए लडकी छेड़ना अपना नैसर्गिक अधिकार मानते हैं ...कलयुगी क्न्हैयाओ ...एक बात गौर से सुनो...कृष्ण बनने से पहले योग ,, ध्यान ,,माया के साथ आध्यात्म को अपनी अंतरात्मा में उतारो,,कृष्ण के समान स्नेहिल प्रेम धारा धरा पर लाओ ...उनकी तरह असुरों ( आज की आराजकता अनैतिकता ) के खिलाफ खड़े हो ... समाज को तोड़ने के लिए नहीं जोड़ने के लिए...... आप लोग कहते है ..और मानते भी है कृष्ण सोलह कलाओं से युक्त थे...राम यद्यपि पुरुषोत्तम राम थे किन्तु सोलह कलाओं से युक्त नहीं थे...सोलह कलाओं का अर्थ " सर्वगुणसंपन्न होना "... अब डालिए खुद पर नजर मापिये खुद को ...फिर कृष्ण कन्हैया बनना ...यशोदा ही कोई नहीं बनना चाहता तो कृष्ण भला कैसे....इसलिए माधुर्यता के कृष्ण को चरित्र में उतारने से पहले सोलह कलाओं को भी देख लेना ..न हो सामने वाला विशेष पारंगत हो... और........" कृष्णजन्माष्टमी की बधाई आपको भी |" ---- विजयलक्ष्मी





"...कृष्ण सा जीवन कृष्ण सा ज्ञान कृष्ण सा युद्ध कृष्ण सी कलाएं कृष्ण सा प्रेम ....क्या सम्भव है धरती पर जहां प्रेम अपनी पराकाष्ठ को छुए तो किन्तु अपवित्र न हो ...पूर्ण पवित्र प्रेम ,देह से विलग ,जहां शरीर विदेह जंक की तरह अलग थलग हो और प्रेम रहे शाश्वत सत्य बनकर ,जपे प्रतिक्षण ,डूबे उस प्रेम में ,जैसे जल में रहके भी कोई गीला न हो 
आत्मा का शुद्ध सरल और शाश्वत रंग ...यदि हाँ ...तो समझो प्रेम पा लिया आपने ..और अगर मिलन की जरूरत है और प
ाने की लालसा बकाया है तो सब कुछ अधुरा ही है ...राधा सा प्रेम मीरा सा बावरापन सुर सी साधना तुलसी सी भक्ति ..सुदामा सी श्रद्धा बिखरा पड़ा है जैसे समेटने की देर है ... राधा सा शाश्वत अटल प्रेम ...राधा पूर्ण स्त्री ...जिसमे स्वयम में ही कृष्ण को समा लिया और उधौ के सम्मुख प्रगट कर प्रेम की पराकाष्ठा के दर्शन कराए ...प्रेम कृष्ण राधा सा ही शाश्वत और सत्य है बाकी वृथा ,देह के साथ शुरू और देह के साथ खत्म ..|देह के साथ रहकर आत्मा भी बीमार समझने लगती है खुद को ..देह रूठकर नेह से छूट जाती है और रह जाती है विलग आत्मा ..यही वो सत्य है जो जीवात्मा स्वरूप में प्रभु से मिलता है अत:प्रेम उज्ज्वल होना चाहिए ..जिसे आत्मा के साथ ले जाया जा सके ..
...सांसारिक मोह बंधन युक्त नहीं ..प्रेम उपासना है
" - विजयलक्ष्मी




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