Wednesday, 9 September 2015

"....प्रेम तो आत्मा की तपस्या है और कुछ नहीं "

" प्रेम ...जो देह को छूकर गुजरे ..उसमे वासना शामिल होगी प्रतिशत चाहे कोई भी हो ...दैहिक आकर्षण प्रेम को सम्बल दे सकता है ...किन्तु आधार नहीं हो सकता ...प्रेम तो मन से शुरू मन पर आकर ही रुक जाता है ..मन या ह्रदय भावनाओं का घर .... जहाँ दरवाजे खिड़की इंट सीमेंट रेत सबकुछ भावनाओ से परिपूर्ण होता है... भावनाओ पर देह नृत्य करती है ..लेकिन अवलम्बित नहीं होती.. प्रेमदीप स्नेह तेल से जलता है .... खूबसूरती का सौदा यदि प्रेम है तो प्रेम है ही नहीं.... इसका तात्पर्य हुआ प्रेम को पढ़ा कदम उठाया तो..लेकिन कदम रख न सके प्रेम की धरा पर ...यदि देह की सीमा ही प्रेम है तो प्रेम कुंठित हो जाता है ...नहीं मालूम मीरा प्रेम परिपूर्ण थी या राधा.... कृष्ण कृपण थे उन दोनों के लिए ...यही सत्य है ... उनका प्रेम किसी भी स्वरूप में देह पर नहीं थमा ...प्रेम तो परलौकिक है... जहाँ दुनिया रिश्ते देह संसार सब तुच्छ है...भावना ही सर्वोपरी और सर्वोत्कृष्ट होती है.... दैहिक प्रेम यदि पूर्ण प्रेम होता तो बलात्कार जैसे शब्द बने ही नहीं होते ,,,देह तो क्षणिक उन्मादित लहरों को थामने का साधन मात्र है...जिसमे कुछ अंश अपनत्व समा जाता है....प्रेम तो आत्मा की तपस्या है और कुछ नहीं "---- विजयलक्ष्मी

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