Wednesday, 18 February 2015

" मगर ...मैं स्त्री कहाँ ....विद्रोहिणी बन बैठी "

" अगर डरी सकुची सी होती तो विमर्श करती 
लडकी होने पर लिखती कुछ शंकाए ढूंढती कुछ समाधान 
मगर ...मैं स्त्री कहाँ ....विद्रोहिणी बन बैठी ...
किसी और से नहीं स्वयम से भी ..
अगर ..जिन्दगी मुझे भी कुछ सामंजस्य की जगह देती तो ..
शायद ..लिखती सहमी सी आँखों का रोता हुआ सन्नाटा ..
जिसे पढ़ सकती दुनिया ..एक औरत की नजर से
देखती उन नजरो में छुपी उस बेरहम पीड़ा को
जो न चाहते हुए भी जिन्दगी के साथ चलती है
भूलने की इच्छा होते हुए भी ,,लहू के साथ बहती हुई प्रतीत होती है
उस समाज की कीचड़ और सामजिक आँख की वो चीकट सोच दिखाई देती
जहां औरत को उम्र के बंधन से पीछे छोड़ ..पचहत्तर वर्ष की उम्र में भी औरत होने का अभिशाप झेलना पड़ा
जहां औरत को औरत होने पर मान नहीं अपमान झेलना पड़ा
अगर मैं भी पैरो पर झुककर गिडगिडाती शायद ...रोटी मिल जाति पेट भरने को
मेरी ही इज्जत की बिना पर नौचती देह को लिए आँख में
विद्रोहिणी को कौन दे पनाह विद्रोह है उसका गुनाह ..
और गुनाह को मुआफी नहीं देता कोई ..पाप होता गर तो शायद ईश इच्छा कर देती पावन मुझे
लेकिन दृष्टिदोष में पारंगत हुआ समाज छिनने को उतावला सर्वहारा बनने की चाहत लिए
एक विद्रोहिणी को रास्ता नहीं मिलता ...मिलता है इनाम पत्थरों का जिन्दा रहते
मौत के बाद एक मन्दिर मिल भी जाये तो क्या ?
मगर मैं बनी भी तो विद्रोहिणी ...फिर भला क्यूँकर
अगर डरी सकुची सी होती तो विमर्श करती
लडकी होने पर लिखती कुछ शंकाए ढूंढती कुछ समाधान
मगर ...मैं स्त्री कहाँ ....विद्रोहिणी बन बैठी ...
किसी और से नहीं स्वयम से भी ..
अगर ..जिन्दगी मुझे भी कुछ सामंजस्य की जगह देती तो ..
शायद ..लिखती सहमी सी आँखों का रोता हुआ सन्नाटा ..
जिसे पढ़ सकती दुनिया ..एक औरत की नजर से "
------ विजयलक्ष्मी

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