Tuesday, 6 November 2012

कुछ और बचा हों दे जा ....

जिन्हें शौंक हुआ रिश्तों के बदलने का वोही बात बनाते नजर आते है ..
ईमान वाले ही मौत के घाट उतर जाते हैं ...
मतलब की दुनिया हुयी किस कदर जब चाहे बुत कर जाते है ,
भरोसा करें किसका अपने ही इल्ज़ाम लगा जाते हैं ,
मौत के दर पहले ही मारने पर उतारू हों जाते हैं ...
चैन जब नहीं मिलता .. कब्र के मुर्दों को आवाज लगा जाते हैं ..
वाह री सियासत की दुनिया ..अब हर रिश्ते ही सिंथेटिक नजर आते हैं ,
अच्छा हुआ कलयुग चल रहा है ...

वक्त को नापो तो जैसे  राम खुद सीता में आग लगा जाते हैं ...
हर वफा के किस्से को ...बेवफाई का का इल्ज़ाम लगा जाते हैं ,
कोई मर भी जाये चाहे बदनीयती का इनाम दिला जाते हैं ,
किया कुबूल ये तोहफा भी तेरा ,कुछ और बचा हों दे जा ...
हम फिर भी तुझे हर इल्ज़ाम से बरी किये जाते हैं .-- विजयलक्ष्मी

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